प्रारंभिक जीवन
बाबा नागपाल जी का जन्म 1883 में हुआ था। वे एक साधारण परिवार से थे लेकिन उनके हृदय में माँ की भक्ति असाधारण थी। बचपन से ही उन्हें आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि थी और वे घंटों ध्यान और पूजा में लीन रहते थे।
उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य माँ की सेवा और मानव कल्याण था। उन्होंने अपने गुरु से दीक्षा प्राप्त की और कठिन तपस्या के माध्यम से आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त किया।
छत्तरपुर में आगमन
बाबा एक संन्यासी बन गए और साधुओं द्वारा उनकी देखभाल, शिक्षा और प्रशिक्षण हुआ। वे पूरे भारत में घूमते रहे और विभिन्न तीर्थस्थलों के दर्शन किए। उनकी यात्राओं का विस्तार विशाल हिमालय, पवित्र कैलाश और मानसरोवर से युक्त शीतल तिब्बती पठार, उत्तर-पूर्व के पर्वत और घाटियाँ, तथा उत्तर और दक्षिण के पवित्र स्थानों तक फैला हुआ था। उन्होंने कई वर्ष कश्मीर में बिताए, जिसके बाद माँ दुर्गा की प्रेरणा से वे दिल्ली की ओर चले आए।
दिल्ली में उन्होंने पहले कुछ समय अर्जुन नगर में बिताया और वहाँ एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। फिर वे छतरपुर गाँव के पास स्थित दुर्गा-आश्रम (जो अब शक्तिपीठ का एक भाग है और वर्तमान स्थान से लगभग एक किलोमीटर दूर है) में आए। अंततः सत्तर के दशक के मध्य में वे वर्तमान स्थल पर आ गए, जो उस समय ऊबड़-खाबड़ बंजर भूमि थी और जंगली झाड़ियों व कँटीले पौधों से भरी हुई थी।